आत्मार्थी आयुषी जैन (आत्मार्थी कन्या विद्या निकेतन ) 2013 Year Pass out

श्री दिगम्बर जैन कुन्द कुन्द कहान आत्मार्थी ट्रस्ट
अध्यात्मतीर्थ, आत्मसाधना केन्द्र,

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तेरह पंथ के तेरह नियम

१. भगवान के चरणों में पंचामृत-अभिषेक व केसर लेप नहीं करना।
२. हरे व सूखे फूल भगवान को नहीं चढ़ाना।
३. भगवान के निर्वाण दिवस पर किसी भी प्रकार का लड्डू न
चढ़ाकर मात्र गोला / बादाम आदि ही चढ़ाना।
४. अशुद्ध अन्न (घुना हुआ, सुरसुरी-कीड़े आदि सहित) भगवान को
नहीं चढ़ाना।
५. दीपक से आरती नहीं करना अथवा अग्नि में धूप नहीं खेना।
६. अखंड ज्योत नहीं जलाना व आशिका नहीं लेना।
७. पूजा खड़े होकर करना, बैठकर नहीं।
८. रात्रि में पूजन नहीं करना।
९. पद्मावती आदि रागी-द्वेषी देवी-देवताओं को नहीं पूजना।
१०. भट्टारकों को नहीं पूजना एवं गुरु नहीं मानना।
११. दिशा, विदिशा, दिग्पालों को नहीं मानना और न ही
ऋषिमण्डल, नवग्रह, कलिकुण्ड आदि की पूजा करना।
१२. हरे (सचित्त) फलों को न ही भगवान को चढ़ाना और न ही
सचित्त फलों से मुनिराज का पड़गाहन करना।
१३. महिलाओं द्वारा भगवान का प्रक्षालन नहीं करना और न ही
भगवान को स्पर्श करना।

 

 

आत्मार्थी आयुषी जैन (आत्मार्थी कन्या विद्या निकेतन ) 2013 Year Pass out

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Jain Natak, Aath Madh, By Atmarthy Kanya Vidhya Niketan

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जैन मंदिर में निषिद्ध 84 क्रियायें

१. मंदिरजी में श्लेष्म (खकार) नहीं डालें।
२. हास्य, कोतूहल न करें।
३. कलह न करें।
४. कला चतुराई न सीखें।
५. कुल्ला कर उगाल न निकालें।
६. मल मूत्र क्षेपण न करें।
७. स्नान न करें।
८. अपशब्द न बोलें।
९. केश न मुड़ायें।
१०. रक्त न निकालें।
११. नाख़ून नहीं कटावें।
१२. फोड़ा पीव आदि का रेचक (मल) न डालें।
१३. नीला पीला पित्त न डालें।
१४. वमन न करें।
१५. भोजन पान न करें।
१६. औषधि चूरण न खाएं।
१७. पान तम्बाकू न चबायें।
१८. दांत-मल, आंख मल, नखमल, नाकमल, कानमल इत्यादि न निकालें।
१९. गले का मैल मस्तक का मैल न निकालें।
२०. शरीर का मैल, पैरों का मैल न उतारें (निकले)।
२१. ग्रहस्थपने लौकिक की वार्ता न करें। पच्चीस प्रकार की विकथा नहीं करना चाहिए।
२२. माता पिता, कुटुम्ब, भ्राता, समधी, समधन आदि लौकिक जनों की शुश्रूषा न करें।
२३. सास, ससुर, जिठानी, ननद आदि के पैर न पड़े।
२४. धर्मशास्त्र के अतिरिक्त लौकिक विद्या न प्रदर्शित करें न वांचे।
२५. श्रृंगार का चित्र न देखें व बहुत अधिक श्रृंगार करके नहीं आयें।
२६. किसी वस्तु का बंटवारा न करें।
२७. अंगुली न चटकायें।
२८. आलस्य से मुड़े नहीं।
२९. मुछों पर हाथ न फेरें।
३०. दीवार का आसरा लेकर न बैठें।
३१. गद्दी, तकिया न लगायें।
३२. पावं पसारकर व पैर के ऊपर पैर रखकर न बैठें।
३३. झूठे मुंह नहीं आयें कुल्ला करके आयें।
३४. कपड़ा न धोवों-प्रक्षालन के कपड़े प्रतिदिन धोकर स्वच्छ उपयोग में लायें।
३५. दाल न दले।
३६. चावल आदि न कूटें।
३७. पापड़ मुंगोडी आदि न सुखाएं।
३८. गाय भैंस तिर्यंच आदि न बांधे।
३९. राजादि के भय से भागकर मंदिर न जाये और न छिपे।
४०. रुदन न करें।
४१. रजा, चोर, भोजन, देश आदि की कथा न करें।
४२. सिगड़ी जलाकर आग न तापें।
४३. रुपया मोहर की जांच न करें।
४४. प्रतिमा जी की प्रतिष्ठा होने के बाद में प्रतिमा जी को टांकी न लगायें।
४५. प्रतिमा जी के अंगो पर केशर, चन्दन आदि का अर्चन न करें।
४६. प्रतिमा जी के नीचे व सिंहासन ऊपर वस्त्र न बिछाएं।
४७. स्त्रियाँ अभिषेक नहीं करें। दीपक न जलायें।
४८. श्रृंगार के प्रयोजन से कांच में मुख न देखें।
४९. नख चिमटी आदि से केश नहीं उखाड़े।
५०. घर से शस्त्र बांधकर मंदिर में नहीं आयें।
५१. खड़ाऊँ(चप्पल) पहनकर मंदिर में गमन नहीं करें।
५२. निर्माल्य नहीं खाएं, न बेचें, न मोल लें।
५३. जिनवाणी को पैर पर नहीं रखना चाहिए।
५४. अपने ऊपर चवर नहीं ढूराएँ।
५५. पवन नहीं कराएँ व स्वयं नहीं करें। (कूलर, ए.सी., हीटर नहीं लगवायें)
५६. तेलादि का विलेपन व मर्दन नहीं करे।
५७. सच्चे देव शास्त्र गुरु को मानना उचित है, उन्हीं को पूजना योग्य है।
५८. प्रतिमा जी के निकट नहीं बैठें, जो पैर दुखने लगे तो दूर आकर बैठना चाहिए।
५९. काम विकार रूप नहीं परिणमना।
६०. स्त्रियों के रूप लावण्य को विकार भाव से नहीं देखना।
६१. मंदिर की विछात (लौकिक कार्यो में उपयोग नहीं लेना)
६२. नगाड़ा, तबला, निशांत (झंडा) आदि वस्तु विवाहादिक के अर्थ नहीं बरतना।
६३. मंदिर की वस्तु उदार नहीं लेना और पैसा देकर मोल भी नहीं लेना।
६४. देव शास्त्र गुरु के दर्शन होते ही तत्काल ही उठ बैठना चाहिए और हाथ जोड़कर नमस्कार करना चाहिए। शक्ति अनुसार भण्डार ग्रह में पैसे डालें।
६५. स्त्रियाँ मंदिर जी में सर ढककर आए।
६६. सरागी पुरुष स्नान कर, वंदन कर, तिलक लगाकर तथा आभूषण श्रृंगार किये बिना ही पूजन करे तथा त्यागी पुरुषों को इसकी बांध नहीं है।
६७. पूजा बिना मंदिर की केशर चन्दन आदि का तिलक नहीं करना चाहिए।
६८. प्रतिमा जी के सन्मुख स्वर्ण आदि धातु के चढ़ाए हुए
फूल टांकन आदि अंगीकार नहीं करना चाहिए। इसके ग्रहण
से निर्माल्य का दोष लगता है।
६९. मन्दिर में वायु का सरना (आदि) अपवित्र क्रिया नहीं
करना चाहिए।
७०. गेंद, गेंदड़ी, चौपड़, शतरंज, ताश आदि किसी प्रकार का खेल नहीं खेलना व शर्त नहीं लगाना चाहिए।
७१. मंदिर जी में भंड़ जैसी क्रिया नहीं करना चाहिए।
७२. रेकारे व तूंकारे के (जोर के शब्द) कठोर वचन , मर्म-छेदी वचन , मस्करी, झूठ विवाद , ईर्ष्या अदया, मृषा, किसी को रोकने, बांधने और मारने आदि के वचन नहीं बोलने चाहिए।
७३. कुतर्क लिये वचन भी नहीं बोलना चाहिए।
७४. कुलांट खाना व पैरों को दबाना या चम्पी करवाना आदि
नहीं करना चाहिए।
७५. हाड़, चाम, ऊन, केश आदि मन्दिर में नहीं ले जाना
चाहिए।
७६. छोटे बच्चों को चटक आदि खाने से रोकना।
७७. रजस्वला स्त्री जब तक शुद्ध नहीं हो जाए व प्रसूति
हुई स्त्री डेढ़ माह तक मन्दिर में न जाए।
७८. गुप्त अंग न दिखायें।
७९. पूजन में हरे फल वगैरा नहीं चढ़ाना।
८०. ज्योतिष वैद्यक, मंत्र-तंत्र नहीं करें।
८१. जल क्रीड़ा आदि कोई भी प्रकार की क्रीड़ा नहीं करें।
८२. लूला-लंगड़ा, व्याकुल (दुःखी), अधिक अंगी, बोना, अंधा, गूंगा, काना,माजरा, शुद्रवर्ग, संकरवर्ण पुरुष स्नानकर उज्जवल वस्त्र पहनकर भी श्री जी का प्रक्षाल, अभिषेक और अष्ट द्रव्य पूजन नहीं करें।
८३. अनछने जल से जिन मन्दिर का काम नहीं कराना
चाहिए।
८४. आलस छोड़कर तथा प्रमाद रहित होकर, छोटे उपदेश का वमन (त्याग) करके भगवान की आज्ञा अनुसार प्रवर्तन करो।

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175 बोल 

Manglacharan In Prakrit And Vedic Sanskit Practice By Atmarthi Kanya

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47 शक्तियां

47  नय

अव्यक्त के 6 बोल

अलिंगग्रहण के 20 बोल

रायचंद जी के 10 बोल

समयसार जी की 16 गाथाएँ

24 तीर्थंकर

5 बालयति

पुण्य पाप से पार अनघ यह आत्मा
और ज्ञानमय निज कारन परमात्मा |
यह परम तत्त्व परमारथ अक्षय आत्मा
निर्विकार निर्ग्रन्थ अलौकिक आत्मा ||

अणुमात्र भी रागादि का सद्भाव है जिस जीव को |
वह सर्व आगम धार भले ही, जानता नहि आत्मा को ||

मैं एक शुद्ध सदा अरुपी, ज्ञान दृग हूँ यथार्थ से |
कुछ अन्य जो मेरा तनिक,परमाणु मात्रा नहीं अरे ||

चैतन्य का स्मरण प्रतिक्षण करो रे
भव के अनंत दुःख को क्षण मे हरो रे |
अक्षय अनंत निज सौख्य निधान पाओ
गाओ अरे नित इसी के गीत गाओ ||

इमि जानि आलस हानि साहस ठानि, यह सिख अदरो |
जबलो न रोग जरा गहे, तबलों झटिति निज हित करो ||

जिनागम के पांच महा सिद्धांत

1. एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का करता नही |
2. समस्त द्रव्यों की समस्त पर्याय क्रमबद्ध होती है |
3. पर द्रव्य का लक्ष्य करने से राग होता है |
4. गुण गुनी का भेद करने से भी राग होता है |
5. निज शुद्धात्मा का आश्रय करने से ही धर्म की शुरुआत , वृद्धि और पूर्णता होती है |

जिनागम के महा सिद्धांत के पांच महा लाभ

1. पंच परमेष्ठी की महिमा |
2. पंचम भाव का आलम्बन (पारिणामिक) |
3. पांच प्रकार के मिथ्यात्व का अभाव |
4. पंच परावर्तन का अभाव |
5. पंचम गति की प्राप्ति |

 

१७५ बोल

अलिंग ग्रहण के २० बोल

१. आत्मा इन्द्रियों से नहीं जानता |

२. आत्मा इन्द्रियों से ज्ञात नहीं होता |

३. आत्मा इन्द्रिय प्रत्यक्ष अनुमान से ज्ञात नहीं होता |

४. आत्मा केवल अनुमान से ज्ञात नहीं होता |

५. आत्मा केवल अनुमान से नहीं जानता |

६. आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञाता है |

७. ज्ञान उपयोग को ज्ञेय पदार्थों का आलंबन नहीं है |

८. ज्ञान उपयोग की वृद्धि बाहय पदार्थों से नहीं होती |

१०. ज्ञान उपयोग में कोई मलिनता नहीं है |

११. ज्ञान उपयोग द्रव्य कर्मों को ग्रहण नहीं करता |

१२. आत्मा विषयों का भोगता नहीं किन्तु स्व का भोगता है |

१३. आत्मा द्रव्य प्राणों से जीवित नहीं रहता |

१४. आत्मा द्रव्य इन्द्रियों के आकार को ग्रहण नहीं करता |

१५. आत्मा लोक व्याप्ति वाला नहीं है |

१६. आत्मा द्रव्य से अथवा भाव से स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक नहीं है |

१७. आत्मा बाहय धर्म चिन्हों को ग्रहण नहीं करता |

१८. अभेद आत्मा गुण भेद को स्पर्श नहीं करता |

१९. नित्य आत्मा अनित्य निर्मल पर्याय को स्पर्श नहीं करता |

२०. शुद्ध पर्याय की अनुभूति ही आत्मा है |

 

४७ शक्तियां

१. जीवत्व

२. चिति

३. दृशि

४. ज्ञान

५. सुख

६. वीर्य

७. प्रभुत्व

८. विभुत्व

९. सर्वदर्शित्व

१०. सर्वज्ञत्व

११. स्वच्छत्व

१२. प्रकाश

१३. असंकुचित-विकाशत्व

१४. अकार्य-कारणत्व

१५. परिणम्य-परिणामकत्व

१६. त्यागोपादान-शून्यत्व

१७. अगुरुलघुत्व

१८. उत्पाद व्यय ध्रुवत्व

१९. परिणाम

२०. अमूर्तत्व

२१. अकर्तृत्व

२२. अभोक्तृत्व

२३. निष्क्रियत्व

२४. नियत प्रदेशत्व

२५. स्वधर्म-व्यापकत्व

२६. साधारण-असाधारण-साधारणासाधारण धर्मत्व

२७. अनंत धर्मत्व

२८. विरुद्ध धर्मत्व

२९. तत्त्व

३०. अतत्त्व

३१. एकत्व

३२. अनेकत्व

३३. भाव

३४. अभाव

३५. भाव-अभाव

३६. अभाव-भाव

३७. भाव-भाव

३८. अभाव-अभाव

३९. भाव

४०. क्रिया

४१. कर्म

४२. कर्तृत्व

४३. करण

४४. सम्प्रदान

४५. अपादान

४६. अधिकरण

४७. संबंध

४७ नय

१. द्रव्यनय

२. पर्यायनय

३. अस्तित्वनय

४. नास्तित्वनय

५. अस्तित्व-नास्तित्वनय

६. अवक्तव्यनय

७. अस्तित्व-अवक्तव्यनय

८. नास्तित्व-अवक्तव्यनय

९. अस्तित्व-नास्तित्व-अवक्तव्यनय

१०. विकल्पनय

११. अविकल्पनय

१२. नामनय

१३. स्थापनानय

१४. द्रव्यनय

१५. भावनय

१६. सामान्यनय

१७. विशेषनय

१८. नित्यनय

१९. अनित्यनय

२०. सर्वगतनय

२१. असर्वगतनय

२२. शून्यनय

२३. अशून्यनय

२४. ज्ञान-ज्ञेय-अद्वैतनय

२५. ज्ञान-ज्ञेय-द्वैतनय

२६. नियतिनय

२७. अनियतिनय

२८. स्वभावनय

२९. अस्वभावनय

३०. कालनय

३१. अकालनय

३२. पुरुषकारनय

३३. दैवनय

३४. ईश्वरनय

३५. अनीश्वरनय

३६. गुणीनय

३७. अगुणीनय

३८. कर्तृनय

३९. अकर्तृनय

४०. भोक्तृनय

४१. अभोक्तृनय

४२. क्रियानय

४३. ज्ञाननय

४४. व्यवहारनय

४५. निश्चयनय

४६. अशुद्धनय

४७. शुद्धनय

 

२४ तीर्थंकर

१. आदिनाथ जी

२. अजितनाथ जी

३. सम्भवनाथ जी

४. अभिनन्दन जी

५. सुमतिनाथ जी

६. पद्मप्रभ जी

७. सुपार्श्वनाथ जी

८. चन्द्रप्रभ जी

९. पुष्पदंत जी

१०. शीतलनाथ जी

११. श्रेयांसनाथ जी

१२. वासुपूज्य जी

१३. विमलनाथ जी

१४. अनन्तनाथ जी

१५. धर्मनाथ जी

१६. शांतिनाथ जी

१७. कुंथुनाथ जी

१८. अरनाथ जी

१९. मल्लिनाथ जी

२०. मुनिसुव्रत जी

२१. नमिनाथ जी

२२. नेमिनाथ जी

२३. पार्श्वनाथ जी

२४. वर्द्धमान जी

 

५ बालयती

१. वासुपूज्य जी

२. माल्लिनाथ जी

३. नेमिनाथ जी

४. पार्श्वनाथ जी

५. महावीर स्वामी जी

 

१०. रायचन्द्र जी के बोल

१. स्वद्रव्य के रक्षक शीघ्र होओ |

२. स्वद्रव्य के व्यापक शीघ्र होओ |

३. स्वद्रव्य के धारक शीघ्र होओ |

४. स्वद्रव्य के रमक शीघ्र होओ |

५. स्वद्रव्य के ग्राहक शीघ्र होओ |

६. स्वद्रव्य की रक्षकता ऊपर लक्ष्य रखो |

७. परद्रव्य की धारकता शीघ्र तजो |

८. परद्रव्य की रमणता शीघ्र तजो |

९. परद्रव्य की ग्राहकता शीघ्र तजो |

१०. परभाव से विरक्त होओ

१६ समयसार की गाथाएँ

१. ध्रुव अचल अरु अनुपम गति, पाये हुए सब सिद्ध को,

मैं वंद श्रुतकेवलि कथित, कहूँ समय प्राभृत को अहो ||१||

२. जीव चरित-दर्शन-ज्ञान स्थित, स्वसमय निश्चय जानना;

स्थिर कर्म पुद्गल के प्रदेशों, परसमय जीव जानना ||२||

३. एकत्व-निश्चय-गत समय, सर्वत्र सुन्दर लोक में |

उससे बने बंधन कथा, जु विरोधिनी एकत्व में ||३||

४. है सर्व श्रुत-परिचित-अनुभूत, भोग बंधन की कथा |

पर से जुदा एकत्व की, उपलब्धि केवल सुलभ ना ||४||

५. दर्शाऊँ एक विभक्त को, आत्मा तने निज विभव से |

दर्शाऊँ तो करना प्रमाण, न छल ग्रहो स्खलना बने ||५||

६. नहिं अप्रमत्त प्रमत्त नहिं, जो एक ज्ञायक भाव है |

इस रीति शुद्ध कहाय अरु, जो ज्ञात वो तो वो हि है ||६||

७. चारित्र, दर्शन, ज्ञान भी, व्यवहार कहता ज्ञानी के |

चारित्र नहिं, दर्शन नहीं, नहिं ज्ञान, ज्ञायक शुद्ध है ||७||

८. भाषा अनार्य बिना न, समझाना ज्यु शक्य अनार्य को |

व्यवहार बिन परमार्थ का, उपदेश होय अशक्य यों ||८||

९. इस आत्म को श्रुत से नियत, जो शुद्ध केवल जानते |

ऋषिगण प्रकाशक लोक के, श्रुतकेवली उसको कहें ||९||

१०. श्रुतज्ञान सब जानें जु, जिन श्रुतकेवली उसको कहे |

सब ज्ञान सो आत्मा हि है, श्रुतकेवली उससे बने ||१०||

११. व्यवहारनय अभूतार्थ दर्शित, शुद्धनय भूतार्थ है |

भूतार्थ आश्रित आत्मा, सुदृष्टि निश्चय होय है ||११||

१२. देखै परम जो भाव उसको, शुद्धनय ज्ञातव्य है |

ठहरा जु अपरमभाव में, व्यवहार से उपदिष्ट है ||१२||

१३. भुतार्थ से जाने अजीव जीव, पुण्य पाप रु निर्जरा |

आश्रव संवर बंध मुक्ति, ये हि समकित जानना ||१३||

१४. अनबद्धस्पृष्ट अनन्य अरु, जो नियत देखे आत्म को |

अविशेष अनसंयुक्त उसको शुद्धनय तू जान जो ||१४||

१५. अनबद्धस्पृष्ट, अनन्य, जो अविशेष देखे आत्मा को,

वो द्रव्य और जु भाव, जिनशासन सकल देखे अहो ||१५||

१६. दर्शन सहित नित ज्ञान अरु, चारित्र साधु सेवीये |

पर ये तीनों आत्मा हि केवल, जान निश्चयदृष्टि में ||१६||

 

अव्यक्त के ६ बोल         

१. छह द्रव्य स्वरुप लोक जो ज्ञेय है और व्यक्त है उससे जीव अन्य है इसलिए अव्यक्त है|

२. कषायों का समूह जो भावकभाव व्यक्त है उससे जीव अन्य है इसलिए अव्यक्त है |

३. चित्सामान्य में चैतन्य की समस्त व्यक्तियाँ निमग्न (अंतर्भूत) है इसलिए अव्यक्त है |

४. क्षणिक व्यक्तिमात्र नहीं है इसलिए अव्यक्त है |

५. व्यक्तता और अव्यक्तता एकमेक मिश्रित रूप से प्रतिभासित होने पर भी वह केवल व्यक्तता को ही स्पर्श नहीं करता इसलिए अव्यक्त है |

६. स्वयं अपने से ही बाह्याभ्यंतर स्पष्ट अनुभव में आ रहा है तथापि व्यक्तता के प्रति उदासीनरूप से प्रकाशमान है इसलिए अव्यक्त है |

 

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